सन्तों की शिक्षा

                              सन्तों की शिक्षा

#परमेश्वर_के_श्रेष्ठ_तथा_उच्च_कोटी_के_विचार

#चरित्रवान_की_कथा

एक #शुकदेव_ऋषि थे। वे श्री #वेदव्यास_के_पुत्र थे। एक दिन वे #दीक्षा_लेने_के_उद्देश्य_से_राजा_जनक_जी के पास मिथिला नगरी में गए। राजा जनक ने कहा कि शुकदेव कल सुबह नाम दूँगा। उनके ठहरने की व्यवस्था अलग भवन में कर दी। एक #सुंदर_युवती को #ऋषि जी की सेवा में परीक्षा लेने के उद्देश्य से भेजा। युवती शुकदेव जी के पलंग पर पैरों की और बैठ गई। ऋषि जी ने पैर सिकोड़कर और मोड़ लिए। युवती ऋषि जी की ओर निकट हुई तो उठकर खड़े हो गए। कहा कि हे बहन! आप अच्छे घर की #बेटी दिखाई देती हो। कृपा कमरे से बाहर जाऐं, नहीं तो मैं चला जाता हूँ। लड़की चली गई। राजा जनक से बताया कि सच्चा व्यक्ति है। ऐसे-ऐसे हुआ। सुबह राजा जनक जी ने ऋषि शुकदेव जी से पूछा कि आपसे मिलने स्त्री आई थी, आपने उसे अंगिकार न करके अच्छे संयम का प्रदर्शन किया है। आप #संयमी_व्यक्ति हैं। धन्य हैं आपके माता-पिता।

#कबीर_परमेश्वर_जी_के_विचार_इनसे_भी_उच्च_तथा_श्रेष्ठ_हैं। वे कहते हैं कि ऋषि शुकदेव भी आत्मज्ञानी नहीं था

क्योंकि जब युवती शुकदेव के पलंग पर बैठी तो शुकदेव ने उसे स्त्री समझकर अपने शरीर से छूने नहीं दिया और खड़ा होकर बाहर जाने की तैयारी कर दी। इससे स्पष्ट है कि शुकदेव जी को #आत्मज्ञान नहीं था। विचार करें कि यदि युवती के स्थान पर युवक बैठ जाता तो शुकदेव जी क्या करते? वे उससे कुशल-मंगल पूछते और पलंग छोड़कर खड़े नहीं होते। कहते कि भईया! पलंग एक ही है, आप पलंग पर विश्राम करो, मैं नीचे पृथ्वी पर आसन लगा लेता हूँ। यदि युवक सभ्य होता तो कहता कि नहीं ऋषि जी! आप पलंग पर विराजो, मैं पृथ्वी पर विश्राम करूंगा। परंतु युवती होने के कारण ऋषि शुकदेव को
#काम_दोष के कारण भय लगा।

#कबीर_परमेश्वर_जी_ने_बताया_है_कि_स्त्री_तथा_पुरूष_आत्मा_के_ऊपर_दो_वस्त्र_हैं। जैसे गीता अध्याय 2 श्लोक 22 में कहा कि अर्जुन! जीव शरीर त्यागकर नया शरीर धारण कर लेता है, इसे मृत्यु कहते हैं। यह तो ऐसा है जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रा त्यागकर नए पहन लेता है। इसलिए आत्म तत्व को जान।

उदाहरण:- एक गाँव में सांग (स्वांग) मण्डली आई। कई दिन सांग किया। पुराने जमाने में सांग के नाटक में पुरूष ही स्त्री का अभिनय किया करते थे। एक लड़का अपने साथी के साथ पहली बार सांग देखने गया। सांग में एक लड़के को लड़की के वस्त्रा पहना रखे थे। छाती भी युवा लड़की की तरह बना रखी थी। प्रथम बार गए लड़के ने अपने साथी (जो कई बार सांग देख चुका था) से कहा कि देख! कितनी सुंदर लड़की है। साथी बोला, यह लड़की नहीं लड़का है। परंतु प्रथम बार गया लड़का मानने को तैयार नहीं। उसको अपने मित्र की बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था। सांग के समाप्त होने के पश्चात् सांगी अपने उस स्थान पर गए जहाँ ठहरे हुए थे। दोनों लड़के भी उनके साथ वहीं गए। उस लड़के ने जो लड़की का स्वांग बनाए हुए था, अपने स्त्री वाले वस्त्र उतारकर खूंटी पर टाँग दिये। छाती से बनावटी दूधी उतारकर बैग में डाल दी। कच्छे-कच्छे में स्नान करने चला गया। यह देखकर नए दर्शक को विश्वास हुआ कि वास्तव में यह लड़का है। अगले दिन उस लड़के दर्शक को वह लड़की के वेश में लड़के में लड़की वाली मलीन वासना दिल में नहीं आई। उसे लड़का दिखाई दे रहा था।
        इसी प्रकार यदि शुकदेव ऋषि को #अध्यात्म_विवेक से आत्म ज्ञान होता तो उससे स्त्री नहीं आत्मा रूप में पुरूष समझकर कहता कि आप पलंग पर विराजो, मैं पृथ्वी पर विश्राम करता हूँ। साधु, संत, फकीर इस विचारधारा से जीवन जीते हैं। साधना करके मोक्ष प्राप्त करते हैं।

#कबीर_परमेश्वर_जी_कहते_हैं

#परनारी_को_देखिये_बहन_बेटी_के_भाव।
#कहे_कबीर_कामनाश_का_यही_सहज_उपाय।।
                 संत रामपाल जी महाराज कबीर परमेश्वर जी के पदचिन्हों पर चलते हैं, संतजी के विचार भी ऐसे ही उच्चकोटि के हैं...और इन्हीं विचारों से प्रभावित होकर लाखों पुण्यात्माओं ने इस विचारधारा को अपनाया हैं जो कि एक सभ्य और स्वच्छ समाज तैयार कर रहे हैं... जिससे समाज में फैल रही एक गन्दी विचारधारा जो कि बेटियों को असुरक्षित महसूस करने पर मजबूर कर देती हैं उसे जड़ से मिटाने का काम कर रहे हैं...
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