संतों की शिक्षा

                बेटी बोझ नहीं होती है


     

वह दिन था बड़ा ही खास…..
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जब मैं आयी थी अपने माता-पिता के घर बनकर उल्लास
खुशी से अपनाया था दोनों ने अपनी बेटी को
फिर क्यूँ था गम, मेरे जन्म पर इस समाज को
क्यों इस समाज के आँखों में खटकी थी मैं
आखिर क्यों इस समाज को बोझ सी लगी थी मैं
जबकि मैं तो थी अपने माता-पिता के लिए खुशियों की बहार
क्यों इस संसार ने बेटियों के जन्म पर सबको डराया है
क्यों मेरे जन्म पर मेरी माँ को दोषी ठहराया है
क्यों पहुँचा दिया गया मुझे और
मेरी माँ के सपनो को शमशान
क्यों न कर सके वो बेटे की जगह बेटी के जन्म पर अभिमान
बेटे अगर होते हैं समाज की जान
तो बेटियाँ भी होती हैं अपने कुल की शान
वंश बढ़ाते हैं बेटे तो नाम रौशन करती हैं बेटियाँ
माता-पिता के लिए तो बेटा हो या बेटी
दोनों ही होते है उनके लिए उनकी आन, बान, शान
फिर क्यों कि़या जाता है जन्म देने से इंकार बेटी को
आखिर क्यों मार दिया जाता है गर्भ में हीं बेटी को
क्यों न इस मानसिकता को बदलकर, इस कुरीति खत्म करें हम
बेटे-बेटी का भेद मिटाकर मानवता पर गर्व करें हम
ताकि बेटियों को मिल सके सुरक्षित कल
ताकि लिंग भेद से मुक्त हो आने वाला कल
जिस दिन बेटी जन्म लेती है, वो दिन होता है बड़ा

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